Moosi Maharani Ki Chhatri: बाला किले की मुख्य सड़क पर अरावली पर्वत की शांत ढलानों पर स्थित मूसी महारानी की छतरी अलवर के सबसे ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह खूबसूरत स्मारक न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि यहां के स्थानीय समुदाय के लिए आस्था का एक पवित्र केंद्र है। आईए जानते हैं क्या है यहां की खास बात।

आध्यात्मिक महत्व 

यह स्मारक रियासत काल के दौरान राजा विनय सिंह द्वारा बनवाया गया था। राजा विनय सिंह ने महाराजा बख्तावर सिंह और उनकी प्रिय रानी मूसी की याद में बनवाया था। यह दो मंजिला संरचना मजबूत बलुआ पत्थर के खंभों पर टिकी हुई है। सूर्यास्त के समय यह स्मारक काफी खूबसूरत नजर आता है। अंदर छत को जटिल पौराणिक चित्रों से सजाया गया है और ऊपरी मंच पर राजा और रानी के नक्काशीदार पद चिन्ह मौजूद है। कहां जाता है कि अगर इन पैरों के निशाने को पानी से धोया जाए और फिर शरीर पर लगाया जाए तो कई बीमारियां ठीक हो जाती है।  छतरी पर कृष्ण लीला और हाथी पर सवार महाराज का जीवन का चित्रण भी है। 

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मूसी महारानी की कहानी 

मूसी महारानी की यात्रा साजिश और त्रासदी दोनों की कहानी है। शाही परिवार की एक सदस्य नरेंद्र सिंह के मुताबिक नौगामा जिले के पास रघुनाथगढ़ में ग्रामीणों के बीच विवाद ने उनके अलवर आने का मार्ग बनाया।  अपनी मां के साथ आई मूसी ने शाही दरबार में अपने गायन, नृत्य और संगीत  प्रदर्शनों से दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया था।

उनकी सुंदरता और प्रतिभा ने महाराजा बख्तावर सिंह का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। हालांकि उनके मिलन में वैभव और दुख दोनों ही थे। महाराज के निधन के बाद मूसी महारानी ने उनकी चिता पर लेटकर सती होने का अंतिम बलिदान दिया।

सांस्कृतिक समारोह का केंद्र 

पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन नियमित रूप से इस स्थल पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं। वार्षिक मत्स्य उत्सव के दौरान यहां भीड़ न केवल इसकी सुंदरता को देखने आती है बल्कि अलवर की समृद्ध विरासत को भी देखने  आती है।