Sweet Potato Farming: राजस्थान के राजसमंद जिले के रेलमगरा के बामणिया कला गांव के किसानों की किस्मत समृद्ध होती जा रही है। वहीं इस गांव के किसानों के लिए बनास नदी वरदान साबित हो रही है। इस नदी के किनारे रतालू की अच्छी पैदावार हो रही है। मीठा पानी और रेतीली जमीन रतालू के लिए बेहतर साबित हो रही है। रेतीली मिट्टी होने के वजह से यहां के किसान रतालु की खेती कर दिन दोगुनी रात चौगुनी कमाई कर रहे हैं। इस फसल की पैदावार इतनी समृद्धि तरीके से हो रही है कि अब इसकी डिमांड पड़ोसी राज्यों में भी बढ़ती जा रही है।
सालाना 20 करोड़ से ज्यादा के रतालू की हो रही है पैदावार
रतालू की खेती ने इस गांव की किसानों की तस्वीर ही बदल दी है। यहां की बनास नदी किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है। क्योंकि नदी की रेतीली मिट्टी के साथ-साथ मीठा पानी रतालू की खेती करने में काफी सहयोग कर रहा है। रतालू को ग्रामीण इलाके में शकरकंद, मीठा आलू और जिमीकंद भी कहते हैं। बता दें कि राजसमंद के रेलमगरा उपखंड में सालाना 20 करोड़ से ज्यादा का रतालू पैदा हो रहा है। जो किसानों को रतालू की खेती करने के लिए प्रमोट करती हैं।
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पड़ोसी राज्यों में रतालू की बढ़ रही है डिमांड
राजस्थान के किसानों की उन्नत रतालू की डिमांड अब पड़ोसी राज्यों में भी बढ़ रही है। वहीं रतालू फसल की दो किस्म की पैदावार होती है। यह दो किस्म है लाल रतालू और सफेद रतालू। इनमें से लाल रतालू की डिमांड गुजरात के सूरत अहमदाबाद और बड़ौदा में ज्यादा है। यहां लाल रतालू ऊंझा की सब्जी व वेफर्स बनाने में काम लिया जाता है। वहीं सफेद रतालू की मांग मध्य प्रदेश के इंदौर में ज्यादा है। यहां नाश्ते के रूप में सफेद रतालू से गराडू व वेफर बनाने में काम में लिया जाता है।
ऐसे होती है रतालू की खेती
रतालू की फसल की बुवाई मार्च-अप्रैल के महीने में की जाती है। रतालू के फसल की बुवाई करने के लिए इसके के कटे हुए टुकड़े को क्यारियों के उठे हुए हिस्से में बोये जाते हैं। जिसकी गहराई 6 इंच की होनी चाहिए। इसके ठीक एक महीने बाद रतालू में बेल निकलती है। इस निकले हुए बेल को सहारा देने के लिए 8 से 10 फीट लंबी लकड़ी रोपी जाती है। वही रतालून के फसल को करीब 15 सिंचाई की जरूरत होती है। इस फसल की बुवाई के ठीक 6 महीने बाद नवंबर तक फसल तैयार हो जाती है।