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Rajasthan Culture: राजस्थान के रेगिस्तान क्षेत्रों में आज भी एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें दूल्हा घोड़े पर नहीं बल्कि ऊंट पर बैठकर आता है। ऊंट के प्रति प्रेम और आदर के चलते कई हजारों साल पहले से यह परंपरा निभाई जाती आ रही है।

Rajasthan Culture: भारत एक ऐसा देश है जो अपनी विविधताओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। ये विविधता अक्सर शादियों में निभाई जाने वाली रस्मों में दिखाई पड़ती है। हर क्षेत्र के हर समुदाय के लोगों के विभिन्न रीति-रिवाज व परंपराएं होती हैं। आपने ज्यादातर शादियों में दूल्हे को घोड़े पर बैठकर आते हुए देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजस्थान के रेगिस्तान इलाकों में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें दूल्हा घोड़े पर नहीं बल्कि ऊंट पर बैठकर अपनी दुल्हन के द्वार पर पहुंचता है। 
 
हजारों सालों से चलती आ रही है यह परंपरा 
राजस्थान में यह परंपरा हजारों सालों से चलती आ रही है। दरअसल, राजस्थान के रेगिस्तान इलाके में पहले यातायात के कोई संसाधन नहीं हुआ करते थे, इसी कारण से लोग ऊंट या बैलगाड़ी का इस्तेमाल किया करते थे। लेकिन अब इन इलाकों में यातायात का साधन उपलब्ध है, फिर भी हजारों सालों से चलती आ रही परंपरा को आज भी निभाया जाता है। यहां दूल्हे घोड़ी के बजाय ऊंट पर बैठकर शादी के दिन तोरण ऊंट पर मारते हैं। शादी विवाह के समय तोरण की रस्म काफी मायने रखती है। 

इन इलाकों में आज भी निभाई जाती है यह रस्म 
बता दें कि आज भी रेबारी, देवासी और मालधारी समाज के लोगों द्वारा गुजरात के कच्छ, सौराष्ट्र, मारवाड़, मेवाड़ और शेखावटी में यह परंपरा देखने को मिलती है। इन क्षेत्रों के लोगों का मुख्य पेशा पशुपालन ही रहा है। लोगों की मान्यता है कि सूखे व अकाल के समय ऊंट ही एक ऐसा जानवर है जो उनके काम आता है और इसी कारण से वे सबसे अधिक प्यार और आदर ऊंट को ही देते है।

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इनमें शादी वाले दिन दूल्हे को राजा कहा जाता है और राजा हमेशा अपने पसंद के जानवर की सवारी करता है। हजारों साल पुरानी परंपरा को आज भी लोगों ने जिंदा रखा है और शादियों में तोरणद्वार पर यह रस्म निभाई जाती है। बुजुर्गों के साथ साथ  इस समाज के युवा भी इस रस्म को बड़े आदर और प्यार से निभाते हैं।

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