Rajasthan Khejri Tree: राजस्थान एक गर्म राज्य है। ऐसे राज्य में हरे भरे पेड़ों की संख्या में कमी एक सामान्य सी बात होती है। यहां वैसे पेड़ नहीं उगते हैं जो सामान्य वातावरण में उगने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन रेगिस्तान वाला राज्य होने के बावजूद यहां की आबादी सघन है ऐसे में लोगों की ऑक्सीजन की डिमांड को पूरा करने के लिए यहां भी पेड़ों की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी की भारत के अन्य राज्यों में है।
तो फिर यह सवाल आता है कि राजस्थान के लोगों की ऑक्सीजन डिमांड कैसे पूरी होती है? तो इसका सरल सा जवाब है कि कुछ पेड़ ऐसे होते हैं जो शुष्क वातावरण में उगने के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक पेड़ है खेजड़ी का पेड़, जो की राजस्थान की शुष्क जलवायु में भी बहुत ही आसानी से उग जाता है। इसीलिए इसे 'राजस्थान का कल्पवृक्ष' भी कहा जाता है। यह पेड़ राजस्थान के लोगों के लिए ना सिर्फ पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजस्थान की कुछ जनजातियों के लिए यह सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
खेजड़ी के वृक्षों की पर्यावरणीय उपयोगिता
खेजड़ी के पेड़ को शुष्क और गर्म जलवायु वाले स्थान पर उगने के लिए जाना जाता है। इस पेड़ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत हीं कम पानी में भी जल्दी सूखता नहीं है क्योंकि इसकी जड़ें बहुत अधिक गहरी होती है जो धरती के अंदर से पानी को अवशोषित करने में उनकी सहायता करती है। इसके अतिरिक्त यह पेड़ पर्यावरण से अन्य पेड़ों की भांति कार्बन डाइऑक्साइड को भी अवशोषित करता है और ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे वातावरण में वायु की गुणवत्ता बनी रहती है।
मृदा अपरदन को रोकने में है सहायक
राजस्थान जैसे रेतीले राज्यों में अरब सागर से उठने वाली हवाओं का तूफान बनाकर आना एक सामान्य बात है इसीलिए वहां मृदा अपरदन की समस्या भी बनी रहती है। यहां बहने वाली हवाएं अपने साथ-साथ मृदा के ऊपरी सतह को आसानी से उड़ाकर ले जाती है। ऐसे में खेजड़ी के वृक्ष मृदा अपरदन की प्रक्रिया को लगभग रोक देते हैं। जिस इलाके में खेजड़ी के वृक्षों की सघनता होती है वहां मृदा अपरदन की समस्या बहुत कम होती है या ना के बराबर होती है।
खेजड़ी के वृक्षों की संस्कृतिक महत्वता
खेजड़ी के पेड़ का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत ही खास है। खासकर बिश्नोई समुदाय के लिए तो यह पेड़ एक बड़े बलिदान का संकेत है। क्योंकि खेजड़ी के पेड़ को संरक्षित करने के लिए हीं 1730 के दशक में बिश्नोई समुदाय के लोगों ने पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए पेड़ से चिपक कर अपनी जान दे दी थी। राजस्थान के आम लोगों की जिंदगी में भी इस पेड़ का बहुत हीं अधिक महत्व है। मरुस्थल की भूमि में यह पेड़ उन्हें छाया देने के साथ-साथ फल भी प्रदान करता है। इस फल का नाम सांगरी है जिसकी सब्जी भी बनाई जाती है।
राजस्थान के थार का रेगिस्तान जीवन के दृष्टिकोण से बहुत हीं विषम परिस्थितियों वाला प्रदेश माना जाता है। लेकिन फिर भी यहां जीवन संभव हो पता है। इसके पीछे का एक महत्वपूर्ण कारण यह खेजड़ी के पेड़ बनते हैं। इसीलिए इन्हें 'रेगिस्तान का कल्पवृक्ष' कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि यह पेड़ गर्म जलवायु में भी लोगों के जीवन को संभव बनाता है। यह पेड़ राजस्थान का राजकीय पेड़ भी है।
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