Brahmani Mata Temple Baran : भारत में अनेकों तरह के मंदिर है जो अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जानें जाते हैं। जहां आस्था का अद्भुत मिसाल देखने को मिलता है। आमतौर पर मंदिरों में भगवान के मुख के दर्शन किए जाते है। लेकिन क्या आपने कभी सुना कि किसी मंदिर की प्रतिमा की पीठ पूजी जाती हो जी हां राजस्थान में एक ऐसा भी मंदिर है जहां देवी के मुख के तरफ नहीं बल्कि देवी की पीठ की पूजा की जाती है। राजस्थान के बारां जिले से 28 किलोमीटर दूर सोरन में ब्राह्मणी माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां देवी की प्रतिमा के पिछले हिस्से को पूजी जाती है यानी की पीठ की पूजा की जाती है। मंदिर लगभग 700 साल पुराना है। इससे गुफा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
700 सालों से पीठ की पूजा
बारां के सोरसन में ब्रह्माणी माता का 700 साल पुराना प्राचीन मंदिर है। मंदिर पुराने किले में स्थित है। मंदिर चारों ओर से ऊंचे पर परकोठे से घिरा हुआ है। इस मंदिर के देवी के पीठ का पहला श्रृंगार होता है और भोग की वस्तुएं पीठ को ही चढ़ाया जाता है। देवी को प्रसाद के तौर पर दाल बाटी चढ़ाया जाता है।
मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भी पीठ के दर्शन करतें है। स्थानीय भाषा में लोग इस पीठ पूजाना भी कहते हैं। कनेर के पत्तों से देवी का श्रृंगार किया जाता है और प्रतिदिन देवी की प्रतिमा की पीठ पर सिंदूर लगाया जाता है।
हर साल भव्य मेले का आयोजन
माता के मंदिर पर हर साल भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जहां गधों का मेला लगता है। साल में एक बार शिवरात्रि के मौके पर इस मेले के लिए कई राज्यों से गधों की खरीद होती है। दूर-दूर से भक्त यहां अपनी मुरादे लेकर आते हैं। मन्नत पूरी होने पर भक्त छत्र,पालन या अन्य वस्तुएं चढ़ाते हैं।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
मान्यता है कि माना जी नामक बोहरा अपने खेत में काम कर रहे थे उनकी पत्नी को खेत में ठेस लग गई और पारस पत्थर निकल आया। पति पत्नी उस पारस पत्थर को अपने घर में लेकर आए। रात में स्वप्न में आकर देवी ने उनसे प्रसन्न होने की बात कही। मान जी की प्रसिद्ध इतनी फैल गई की यह बात उस राज्य के राजा तक पहुंच गई कि मान जी के पास पारस पत्थर है। राजा ने उन्हें दरबार में आने का आदेश दिया लेकिन माना जी दरबार में नहीं पहुंचे । तो राजा ने अपने सैनिकों को उन्हें पकड़ कर लाने के लिए भेज दिया।
माना जी ने पारस पत्थर को पास के स्थित एक कुंड में फेंक दिया। विपत्ति के कारण उनकी पुत्रवधू ने देवी को अपशब्द कह दिया। जिस कारण देवी नाराज होकर वहां से जाने लगी। जाते समय देवी की पीठ माना जी के तरफ थी मन ने पीछे से आवाज लगते हो कहा कि जब तक मैं तीर्थ यात्रा से ना आ जाऊं तब तक आप यही रहना। कहा जाता है कि माना जी की कभी तीर्थ यात्रा से लौटकर नहीं आए और वचनबद्ध होने के कारण वहां देवी विराजमान हो गई तब से देवी की पीठ की पूजा की जाने लगी।
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