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Kota student suicide: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान संयुक्त प्रवेश परीक्षा (आईआईटी-जेईई) और नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा की तैयारी करने लाखों बच्चे हर साल कोटा जाते है, लेकिन कई सालों से लगातार बच्चों के सुसाइड के केस बढ़ते जा रहे है।

Kota student suicide: राजस्थान का कोटा शहर देश कई लाखों छात्रों का सपना पूरा करता है जो अपना और अपने मां बाप का सपना लेकर दूर-दूर से आते है। कोटा ने शहर को कई हुनहार बच्चें दिए हैं जो आज बड़े-बड़े संस्थानों में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। वहीं इस शहर की काली सच्चाई यह है कि भले ही हजारों बच्चों को सफलता मिल जाती है लेकिन लाखों बच्चों के हाथ लगती है केवल निराशा।

इनमें से कई अपनी हार को अपनाकर आगे बढ़ जाते है तो कई अपनी जिंदगी को खत्म करने का फैसला लेते हैं। इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि देश में कई ऐसे हब है जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है लेकिन क्यों कोटा से ही ज्यादा सुसाइड के केस सामने आते है। 

जटिल पढ़ाई के साथ साथ मिलता है मानसिक तनाव 
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के दिमाग में हर समय एक ही सपना रहता है कि उनका परीक्षा में चयन हो जाएं। ऐसे में अपनों की उम्मीदों और विश्वास पर खरा उतरना बच्चों के मन और मस्तिष्क में जाने-अंजाने में एक तनाव पैदा कर देता है।  कई बच्चों के लिए यह तनाव कारगर साबित होता है तो वहीं कई छात्र इसे नहीं झेल पाते है और गलत कदम उठा लेते है। 

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कोटा में सुसाइड का आंकड़ा
कोटा पुलिस के अनुसार जनवरी 2019 से लेकर दिसंबर 2022 के बीच विभिन्न कोचिंग सेंटरों में नामांकित 27 छात्रों समेत 52 छात्रों ने सुसाइड की है। वहीं साल 2022 में कोचिंग सेंटरों में सबसे ज्यादा 15 आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए है। साथ ही वर्ष 2023 में अब तक दर्जन भर से भी बच्चें अपनी जान दे चुके है। 

क्यों कोटा में बढ़ते जा रहे है आत्महत्या के मामले?

1. पढाई का तनाव: कोटा में ज्यादातर दसवीं के बाद के बच्चें परीक्षा की तैयारी करने आते है, ऐसी उम्र में छात्र मानसिक तनाव को नहीं झेल पाते है और गलत कदम उठा लेते है।  भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान संयुक्त प्रवेश परीक्षा (आईआईटी-जेईई) और नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा के लिए व्यापक तैयार की जरूरत होता है। जिससे यह मानसिक और भावनात्मक रूप से कठिन हो जाता है। 

2. परिवार से अलगाव: देश के अलग-अलग कोने से बच्चे यहां अपने परिवार से दूर रहते है। ऐसे में परिवार से अलगाव अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव और नकरात्मक भावनाओं को पैदा कर देता है, जिससे मानसिक तनाव और भी बढ़ जाता है। 

3. भावनात्मक समर्थन की कमी: अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल के चलते, छात्रों को साथियों या फिर कोचिंग स्टाफ से भावनात्मक समर्थन लेना मुश्किल हो जाता है। 

4. अवास्तविक उम्मीदें: प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छा प्रर्दशन करने के लिए ज्यादातर बच्चों पर अत्यधिक सामाजिक और माता-पिता का दबाव रहता है। फेल होने के डर से अवास्तविक उम्मीदें, तनाव, चिंता और अवसाद में बच्चे प्रेशर लेने लगते है।

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