Rajasthan Art Works: चित्रकला की इस शैली में पारंपरिक रूप से कपड़े या कैनवास के एक लंबे टुकड़े पर पेंटिंग की जाती है। फड़ का क्षेत्रीय भाषा में अर्थ होता है तह। फड़ों पर राजस्थान के लोक देवताओं को मुख्य रूप से चित्रित किया जाता है। इन देवताओं में पाबूजी और देवनारायण के आख्यान शामिल हैं।
पाबूजी के पद लगभग 15 फीट लंबे होते हैं, वहीं देवनारायण के पद आमतौर पर लगभग 30 फीट के होते हैं। चित्रित फड़ों का उपयोग मंदिर में किया जाता है, जिनकी पूजा आसपास के क्षेत्र के रेवाड़ी समुदाय द्वारा की जाती है। फड़ को केवल एक चित्र नहीं माना जाता, बल्कि इसे पूर्ण रूप से भगवान माना जाता है और इसकी पूजा भी की जाती है।
फड़ चित्रकला शुरू होने का इतिहास
लोक कथाओं के ज्ञानी डॉक्टर महेंद्र भानावत के अनुसार, देवनारायण जी के अंतिम समय में उनके भक्तों ने आग्रह किया था कि वे अपने शरीर को त्यागने से पहले अपने भक्तों को वे स्मृति स्वरूप छवि दे जाएं। भक्तों के आग्रह पर उन्होंने अपने एक सेवक को चित्रकार के नाम के साथ-साथ जानकारी दे दी कि चित्र में क्या-क्या होना चाहिए।
चित्र बनने के पश्चात, जब चित्र को देवनारायण जी के पास लाया गया, तब उन्होंने चित्र देखकर कहा, "मैंने चित्र के लिए बोला था, तू ये फड़ क्यों लेकर आया?" इसके पश्चात से ही ये चित्र फड़ चित्र कहलाए और इन्हें बनाने की परंपरा शुरू हुई।
जोशी समुदाय द्वारा प्रचलन
इस शैली में श्री लाल जोशी और प्रदीप मुखर्जी ने क्रांति लाने का कार्य किया था, जबकि चित्रकला पारंपरिक रूप से जोशी समुदाय द्वारा ही प्रचलित की गई थी। यह कला लोगों के बीच में फैल सके और लोग इस कला को सीख सकें, इसलिए 1960 में श्री लाल जोशी ने जोशी कला केंद्र के नाम से एक स्कूल की स्थापना की। आज के समय में इस स्कूल को चित्र शाला के रूप में जाना जाता है और यह स्कूल भीलवाड़ा में स्थित है।
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