Rajasthan Chopra Tradition: आज के तकनीकी दौर में जहां लोग नई टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भारत में ऐसे कई लोग भी हैं, जो ग्रह-नक्षत्रों की गणना के लिए सालों पुरानी परंपराओं पर विश्वास कर रहे हैं। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको राजस्थान के बांसवाड़ा की 135 वर्ष पुरानी परंपरा के बारें में बताने जा रहे है जिसको सुनने के लिए लाखों लोग दूर-दूर से यहां आते हैं।
135 साल से चलती आ रही है यह परंपरा
जानकारी के लिए बता दें कि बांसवाड़ा जिले के भूंगड़ा गांव की चोपड़ा परंपरा 135 साल से मकर संक्रांति के अवसर पर आदिवासी इलाके के लोगों द्वारा चलाई जा रही है। पिछले 135 वर्ष से बांसवाड़ा का पंड्या परिवार चोपड़ा बनाता आ रहा है। इस परंपरा के मुताबिक मकर संक्रांति के दिन ज्योतिष गणना के आधार पर बनाई गई चोपड़ा को पढ़कर आगामी साल की भविष्यवाणी की जाती है। लाखों की भीड़ इश भविष्यवाणी को सुनने के लिए इकट्ठा होती है। आज भी कई लोग इस पर अटूट विश्वास करते हैं।
अब तक रहे चोपड़ा वाचक
1. पंडित दौलतराम पंड्या (1890-1929)
2. पंडित गेफरलाल पंड्या (1930-1967)
3. पंडित प्रकाशचंद्र पंड्या (1968-2011)
4. पंडित दक्षेश पंड्या (2012 से अब तक)
आखिर क्या है चोपड़ा परंपरा?
चोपड़ा असल में एक प्रकार का ज्योतिषीय कैलेंडर होता है, जिसे देवउठनी एकादशी से लेकर मकर संक्रांति तक कई प्रकार के पंचांगों का अध्ययन करके बनाया जाता है। इसे तैयार करते समय ज्योतिषी ग्रह-नक्षत्रों की चाल का भी अध्ययन किया जाता है। साथ तैयार किए गए चोपड़ा में आगामी वर्ष की भविष्यवाणी जैसे मौसम, महामारी, राजनीति, कृषि आदि से जुड़ी जानकारी दी जाती है।
इस साल हुई थी चोपड़ा परंपरा की शुरुआत
साल 1890 में तत्कालीन भूगंडा निवासी पंडित दौलतराम पंड्या ने इस परंपरा की शुरूआत की थी। इसके बाद उनके बेटे पंडित गेफरलाल पंड्या ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 1968 में उनके पौते पंडित प्रकाशचंद्र पंड्या ने इस परंपरा को आगे बढ़ाए रखा। आज उनके प्रपौत्र पंडित दक्षेश पंड्या इसे आगे बढ़ा रहे है। उन्होंने बताया कि चोपड़ा के माध्यम से की जा रही भविष्यवाणियां हर साल सही साबित होती है।
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