Rajasthan Handicrafts: भारत को हस्तशिल्प कला का सर्वोत्तम केंद्र माना जाता है। भारत में अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग हस्तशिल्प हैं, जैसे कश्मीर के पशमीना शॉल, तमिलनाडु की कांजीवरम साड़ी, आंध्र प्रदेश की पोचमपल्ली सिल्क साड़ी। इसी तरह राजस्थान की शिल्प कला में ब्लू पॉटरी प्रमुख स्थान रखती है।
जयपुर की हस्तशिल्प कला: ब्लू पॉटरी
राजस्थान का जयपुर शहर गुलाबी नगरी के नाम से प्रसिद्ध होने के साथ-साथ यहां होने वाली हस्तशिल्प कारीगरी के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के हस्तशिल्पों को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है और इन्हीं में से एक है ब्लू पॉटरी। यह हस्तशिल्प मूल रूप से पश्चिम एशिया की है और इसका नाम आकर्षक नीली डाई से आया है, जिसका उपयोग मिट्टी के बर्तनों को रंगने के लिए किया जाता है। यह जयपुर में विकसित एक जटिल कला मानी जाती है।
डेल्फ्टवेयर और कृपाल शैली
नीली मिट्टी के बर्तनों की कला मानव सभ्यता के विकास से ही जुड़ी हुई है। इसे डेल्फ्टवेयर या डेल्फ्ट पॉटरी भी कहा जाता है। ब्लू पॉटरी को व्यापक रूप से जयपुर के एक पारंपरिक शिल्प के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस कला में चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नक्काशी का कार्य किया जाता है।
कृपाल सिंह शेखावत को ब्लू पॉटरी शिल्प कला क्षेत्र का जादूगर कहा जाता है। इन्होंने 25 रंगों का उपयोग करके नई शैली का निर्माण किया था, जिसका नाम "कृपाल शैली" है। अपनी इसी कला के लिए इन्हें 1974 में पद्मश्री और 1980 में "कलाविद" की उपाधि प्रदान की गई थी।
राम सिंह द्वितीय का इस कला में योगदान
इस कला का सर्वाधिक विकास राम सिंह द्वितीय के समय में हुआ था। राम सिंह द्वितीय ने चुरामन और कालूराम कुम्हार को इस कला को सीखने के लिए दिल्ली भेजा था। इस कला को लगभग 400 साल पुरानी माना जाता है। नीली डाई इतनी ज्यादा आकर्षक होती है कि पॉटरी पर जब इसे लगाया जाता है, तो पॉटरी में गजब की चमक आ जाती है।
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