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तेरहताली नृत्य: राजस्थान का फेमस तेरहताली नृत्य की शुरूआत पाली जिले के पादरला गांव से हुई है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद साल 1948 में इस लोक कला को दिल्ली में मंच दिया था।

तेरहताली नृत्य: राजस्थान की विभिन्न प्रकार के नृत्य आज पूरी दुनिया भर में मशहूर है। पधारो म्हारे देश व केसरिया बालम जैसे गीतों पर किए जाने वाले घूमरे और सादगी से भरे नृत्य राजस्थान को अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाते है। 

पहले प्रधानमंत्री ने दिलाई थी कला को नई पहचान 
तेरहताली नृत्य को एक अलग पहचान दिलाने और इसे फिर से जिवित करने का श्रेय देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जाता है। जिन्होंने आजादी के बाद साल 1948 में इस लोक कला को दिल्ली में एक मंच दिया था और राजस्थान की संस्कृति को पूरे देश के सामने पेश किया था। 

वर्ष 1948 में लाल किले पर आयोजित हुए कार्यक्रम में पहली बार जवाहरलाल नेहरू ने पाली के इस लोक नृत्य के कलाकारों को मंच दिया ताकि वे अपनी कला पूरे देश के सामने कर सकें। आजादी के बाद इस नृत्य का खूब प्रचार-प्रसार किया गया। यहीं से इस कला को नई राह मिलने लगी और धिरे-धिरे इस कला ने विश्व में अपनी एक अनोखी पहचान बना ली। आज के समय में इस नृत्य ने अमेरिका जैसे देशों को अपना दिवाना बनाया हुआ है। इस संस्कृति को कंकू बाई व गोरमदास की पांचवी पीढ़ी की मीना देवी द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। 

यहां से हुई थी तेरहताली नृत्य की शुरूआत 
जानकारी के लिए बता दें कि तेरहताली नृत्य की शुरूआत राजस्थान के पाली जिले के पादरला गांव से हुई। यहां की कमांड जाती द्वारा इस नृत्य को लोक देवताओं के वाचन और गीतों पर किया जाता था। इस दौरान महिलाएं अपने हाथ और पैर में मजीरे पहनकर घरेलू कामों जैसे बिलोना, फसलों को काटना आदि को एक लोक नृत्य में बदल दिया। इस नृत्य में कथा के गीतों पर प्रस्तुति पेश की जाती है। महिलाओं की टोली एक साथ मंच पर तेरहताली नृत्य करती है।

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