Mayra tradition : राजस्थान अपने अनोखे तौर तरीके और परंपरा के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। आज के इस आधुनिकरण युग में जहां रिश्ते सिर्फ अब नाम के सिमट रह गए हैं। वही राजस्थान में एक ऐसी अनूठी परंपरा है जो रिश्तो के लिए एक मिसाल कायम करती है। राजस्थान के शादियों में कई रीति रिवाज होते हैं यह ऐसा ही रिवाज है मायरा परंपरा जिसे अन्य जगहों पर भात के नाम से भी जाना जाता है।
राजस्थान में मायरा परंपरा बहुत प्रसिद्ध है। सदियों से लोग इस परंपरा को निभाते आए हैं। इस परंपरा के अंतर्गत मामा अपने बहन के बच्चों यानी भांजे और भजियों के लिए मायरा लेकर आते हैं। अपनी बजट के मुताबिक मामा भांजे और भजियों की शादी में गहने,कैश, कपड़े लेकर आते हैं। शादी समारोह में मामा अपना विशेष योगदान देते हैं। दिए जाने वाला ये उपहार एक तरह से लड़की के माता-पिता के विवाह के खर्चों में मदद करता है। मायरा परंपरा मामा का भांजे और भांजियों के प्रति प्रेम को दर्शाता है।
परंपरा का उद्देश्य बहन के परिवार को मदद देना
मारवाड़ क्षेत्र में बहन बेटियों की शादी में मायरा भरने की परंपरा है। जिसमें ननिहाल पक्ष के लोग यानी की मामा और नाना भांजे और भांजियों की शादी के दौरान मायरा भरने जाते हैं। ताकि वह अपनी बहन और बेटियों के शादी के दौरान आर्थिक मदद दे सके। यह परंपरा काफी लंबे वक्त से निभाई जा रही है।
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मायरा के पीछे का इतिहास
मायरा शुरुआत नरसी भगत के जीवन से हुई थी। नरसी की बेटी मीराबाई का विवाह अंजार नगर में हुआ था। नरसी श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वही जब नीना बाई की लड़की बड़ी हुई उसकी शादी के लिए ननिहाल के तरफ से मायरा देने के लिए नरसी के पास कुछ नहीं था। नरसी ने सबसे मदद की गुहार लगाई लेकिन किसी ने मदद नहीं की। नरसी भगवान श्री कृष्ण का नाम लेकर टूटी फूटी बैलगाड़ी के साथ खुद ही लड़की के ससुराल के लिए निकल पड़े। कैसे कहा जाता है कि श्री कृष्णा उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर खुद ही भात भरने पहुंचे थे।