Rajasthani Singing: मांड राजस्थान की एक प्रचीन गायन शैली में से एक है। इसे कई प्रकार से गाया जाता है। राजस्थान के इस गायन ने कई सालों से भारत के शास्त्रीय संगीत में प्रमख रूप से योगदान दिया है। भले ही इन लोक गीतों को राजपूत महाराजों के मनोंरजन के लिए गाया जाता था, लेकिन अब ये लोकगीत राजस्थान की धरोहर में से एक है।
मांड गायन का इतिहास
मांड गायन की शुरूआत जैसलमेल क्षेत्र में 10वीं सदी के आसपास हुई थी। इस प्रकार के गायन में राजस्थान के लोकगीतों का वर्णन किया जाता है। राजस्थान में ढोला-मारू, मूमल-महेंद्र और अन्य प्राचीन नायकों और पेशेवर गायकों द्वारा इन लोकगीतों को गाया जाता हैं।
मांड गायन की मशहूर गायिकाएं
मांड गायन बेहद मशहूर है जिसे कई फेमस गायिकों द्वारा गाया जाता है। इस सूची में बीकानेर के अल्ला-जिल्हा बाई का नाम शामिल है, जिन्होंने मशहूर गीत केसरिया बालम आवो गाया था। भेरवी युक्त मांड गायकी गवरी देवी भी प्रसिध्द है।
कठिन राग से गाया जाता है मांड
मांड गीत का राग सुनने में काफी सहज होता है, लेकिन इसकी राग बेहद कठिन होता है। मांड गायन वादन मारवाड के इलाकों में प्रसिध्द है। मांड गायन की राग में शुध्द स्वरों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा निषाद कोमल का यूज किया जाता है। इस गीत के राग में स्वर लगाव का महत्व है।