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International Womens Day Special: जानिए राजस्थान की पहली महिला डॉक्टर - पार्वती गहलोत की कहानी। जो आजादी से भी 19 साल पहले 1928 में डॉक्टर बनी थी।

Rajasthan First Female Doctor: आजादी से पहले महिलाओं को पढ़ने लिखने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता था। क्रांतिकारी सोच रखने वाली कई महिलाओं ने अपनी बेड़ियों को तोड़कर पढ़ने लिखने की पहल शुरू की। जिनमें से सावित्री बाई फुले भी थींं, जो कि आज महिलाओं के लिए एक मिसाल हैं। आज के दौर में महिलाओं को पढ़ाने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रखी है। साथ ही बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पहल के अंतर्गत कईं अभियान भी चला रही है। जिससे महिलाओं को शिक्षा मिल सके। आज हम देखें तो कई महिलाएं ऐसी हैं, जो बड़े बड़े मुकाम पर हैं। खेलों में भी महिलाएं बड़ा मुकाम हासिल कर रही हैं। ऐसी ही एक कहानी है, राजस्थान की पहली महिला डॉक्टर की। जिनका नाम है- डॉ. पार्वती गहलोत।

कौन है पार्वती गहलोत 

पार्वती गहलोत का जन्म 21 जनवरी 1903 को राजस्थान के जोधपुर शहर में हुआ था। उनके पिता को शिक्षा पसंद और सामाजिक व्यक्ति थे। जिसकी वजह से इन्होंने समाज डॉक्टर की पढ़ाई भी की। इनके चाचा एक व्यापारी थे, जिन्होंने पार्वती की पढ़ाई का सारा खर्च उठाया। पार्वती गहलोत प्रसिद्ध इतिहासकार और समाज सुधारक श्री जगदीश सिंह गहलोत की भतीजी भी थी। पार्वती को उनके परिवार ने पूरा सहयोग किया था। 

जिस समय पर बेटियां घर की दहलीज तक नहीं लांघती थीं, उस समय पर पार्वती गहलोत डॉक्टर बनी थी। कहना गलत नहीं होगा कि इन्होंने भारत की नहीं बल्कि राजस्थान की बेटियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले थे। अगर दृढ़ निश्चय हो और परिवार साथ दे तो, हर कोई किसी भी मुकाम पर पहुंच सकता है। पार्वती का डॉक्टर बनने के सपना को उनके परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर पूरा किया था। 

1928 में ही बन गई थी राजस्थान की पहली महिला डॉक्टर 

भारत को आजादी 1947 में मिली थी और पार्वती 1928 में ही राजस्थान की पहली डॉक्टर बन गई थी, यानी आजादी के 19 साल पहले। इन्होंने दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई पूरी की थी। इनका डॉक्टर बनना राजस्थान की हर महिला की हो रही पढ़ाई के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। 

भारत ही नहीं बल्कि इन्होंने इंग्लैंड जाकर भी डॉक्टर की पढ़ाई की थी। मारवाड़ के महाराजा ने इनकी पढ़ाई के प्रति जागरूकता, कर्तव्यनिष्ठा, कुशाग्रता और दक्षता देखकर इन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा था। 1936 में डॉक्टर की पढ़ाई पूरी करके पार्वती गहलोत भारत डॉक्टर बनकर वापस लौटी थीं। 

डॉक्टरों का काम है 24 घंटे काम करना

पार्वती गहलोत का कहना था कि डॉक्टर की ड्यूटी का कोई समय नहीं है। उन्होंने मरीजों का इलाज 24 घंटे और सातों दिन किया था। पार्वती इलाज के साथ मरीजों की सेवा भी करती थीं। पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थे। मरीजों की सेवा वें डॉक्टर की जगह एक मां बनकर किया करती थीं। जोधपुर के महाराज उन्हें 100 रुपए प्रति माह का भत्ता दिया करते थे। उन्होंने स्थानीय उम्मेद अस्पताल में कईं साल तक अशीक्षिका के पद पर काम किया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में लगा दिया। राजस्थान की इस महान विभूति का देहावसान 27 अक्टूबर 1988 को हो गया था।

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