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Jamnalal Bajaj History: महात्मा गांधी के पांचवें बेटे कहे जाने वाले राजस्थान के सीकर में जन्मे जमलाल बजाज ने 17 साल की उम्र में ही करोड़ों का बिजनेस खड़ा कर दिया था। साथ ही उन्होंने देश के लिए अपनी 20 एकड़ की जमीन भी दान कर दी थी। चलिए आपको उनकी कहानी बताते हैं।

Jamnalal Bajaj History: जब भी किसी उद्योगपति की बात आती है, तो हमारे दिमाग में एक हाई-फाई लाइफस्टाइल का चित्र सामने आता है। एक व्यापारी आदमी हर चीज को फायदे और नुकसान के तराजू पर तौलकर फैसला लेता है। उनकी लिस्ट में सबसे पहले उनका धंधा आता था। आज हम देश के उस व्यापारी, क्रांतिकारी, समाजसेवक के बारे में बताने वाले हैं, जिन्होंने अपने समर्पण और त्याग से राष्ट्रप्रेम एक ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसने महात्मा गांधी व विनोबा भावे जैसे लोगों को भी उनका पारिवारिक सदस्य बना दिया।  

जमनालाल बजाज का जन्म 

जमनालाल का जन्म 4 नवम्बर 1889 को राजस्थान की जयपुर रियासत के सीकर के "काशी का बास" में एक गरीब मारवाड़ी किसान के यहां हुआ था। पिता कनीराम गरीब किसान थे और माता बिरदीबाई गृहिणी थी। 5 साल की उम्र में उनकी किस्मत रातों-रात बदल गई। एक बार वे अपने घर के बाहर खेल रहे थे, तभी रास्ते जा रहे वर्धा के सेठ बच्छराज की नजर जमनालाल पर पड़ी और सेठ बच्छराज और उनकी पत्नी सादीबाई बच्छराज ने उन्हें अपने पोते के रूप में खोद लेने का फैसला किया।

दोनों एक अमीर राजस्थानी व्यापारी जोड़े थे जो वर्धा, महाराष्ट्र में बस गए थे। गरीब परिवार में जन्में जमनालाल की किस्मत उन्हें ऐशे ओ आराम की जिंदगी में ले आई। लेकिन उन्हें कभी भी ये अमीरी रास नहीं आई और उन्होंने देश सेवा करने का फैसला किया। 

17 की उम्र में खड़ा किया करोड़ों का व्यापार 

समय गुजरता गया और 13 साल की उम्र में जमनालाल का विवाह 9 वर्ष की जानकी से कर दिया गया। इसके बाद 17 साल की उम्र में जमनालाल ने अपने कंधों पर कारोबार संभालना शुरू कर दिया। व्यापार के क्षेत्र में उन्होंने एक ऐसा बीज बोया जो आज एक सघन पेड़ बन चुका है। इसकी शुरुआत उन्होंने शुगर मिल से की। इसके बाद कई कंपनियां स्थापित की और करोंड़ो का व्यापार बनाया।   

गांधी जी के 5वें बेटे बनने की जताई इच्छा 

जमनालाल धिरे-धिरे समझ रहे थे कि उन्हें अपने जीवन में क्या करना है। लेकिन इसके लिए उन्हें एक अच्छे गुरू की तलाश थी। इस कड़ी में वे पहले मदनमोहन मालवीय से मिले। फिर रबीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ भी उन्होंने चर्चा की। साथ ही कई साधुओं और धर्मगुरुओं से भी मिले। इसके बाद वे स्वाधीनता आन्दोलन में जुड़ते गए। इसी बीच उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, इसके बाद जमनालाल को उनका गुरू मिल चुका था और वे पूरी तरह से गांधीजी को अपना सर्वस्व समर्पित कर चुके थे।

इन आंदोलनों में जमनालाल ने लिया था हिस्सा

वर्ष 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के समय जमनालाल द्वारा एक अजीब इच्छा जाहिर की गई। उन्होंने गांधीजी से कहा कि वे जमनालाल को उनका पांचवा बेटा बना लें। इस बात को सुनकर पहले तो गांधीजी आश्चर्य हुए, लेकिन बाद में उन्होंने इस बात पर अपनी स्वीकृति दे दी। 

साल 1921 में ‘सत्याग्रह आश्रम’ बनाने के लिए जमनालाल बजाज ने अपनी 20 एकड़ की जमीन दान की थी। इतना ही नहीं उन्होंने 921 में असहयोग आन्दोलन, 1923 में नागपुर में हुए झंडा सत्याग्रह, 1929 में साइमन कमीशन का बहिष्कार आंदोलन, 1930 में डांडी यात्रा, 1941 मं एंटी वॉर कैंपेन आंदोलन में हिस्सा लिया। 11 फरवरी, 1942 को मस्तिष्क की नस फट जाने की वजह से उनका देहांत हो गया। साल 1977 में जमनालाल बजाज फाउंडेशन की स्थापना की गई।

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