Rajasthan History: राजस्थान के इतिहास में एक से एक वीर योद्धा हुए, जिन्होंने अपनी अदम्य शक्ति का परिचय देते हुए इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करवा दिया। लेकिन राजस्थान के इतिहास में एक ऐसा भी योद्धा था, जो इंसान नहीं था, लेकिन आज भी उसका नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि उसने एक वफादार साथी होने का पूरा कर्तव्य निभाया था। यह योद्धा था महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक।
कौन था चेतक?
एक ऐसा घोड़ा जिसने महाराणा प्रताप की शक्ति को कई गुना बढ़ाने का काम किया। इस घोड़े पर बैठकर महाराणा प्रताप ने युद्ध में अपनी अदम्य साहस का परिचय दिया। इस घोड़े के बारे में बताया जाता है कि यह घोड़ा काठियावाड़ी नल का एक घोड़ा था, जिसे गुजरात के व्यापारी ने महाराणा प्रताप को भेजा था। महाराणा प्रताप और चेतक के बीच की तालमेल को इसी बात से समझा जा सकता है कि महाराणा प्रताप जिस दिशा में सोचते थे और चेतक इस दिशा में बढ़ जाता था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
हल्दीघाटी के युद्ध में जहां एक ओर महाराणा प्रताप की कुछ हजार की सेना थी, वहीं दूसरी ओर मुगलों के पास एक लाख सैनिकों और हाथियों के साथ युद्ध के मैदान में उतरे थे। ऐसे में मुगलों का सामना करने के लिए महाराणा प्रताप ने चेतक के मुंह पर हाथी का सूंड बांध दिया था, जिसके कारण दूर से देखने पर ऐसा लगता था कि कोई हाथी का बच्चा आ रहा है। लेकिन हाथी के बच्चे में घोड़े जैसी गति देखकर मुगल सैनिक अचरज में पड़ जाते थे, और जब तक उन्हें यह बात समझ आती कि वह हाथी नहीं बल्कि घोड़ा है, तब तक उनका सिर कलम हो चुका होता था।
चेतन ने कैसे की महाराणा के प्राणों की रक्षा?
बताया जाता है कि गजब की फुर्ती और तेजी के साथ चेतक ने हल्दीघाटी की युद्ध में महाराणा प्रताप के पुराने की भी रक्षा की थी। जब 18 जून 1576 को हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा जा रहा था, तो महाराणा प्रताप के सामने अकबर का सेनापति मानसिंह था, जिसके बहन की शादी अकबर से हुई थी। मानसिंह हाथी पर सवार था। मानसिंह को देखते ही महाराणा प्रताप ने चेतक को उसकी ओर बढ़ने का इशारा किया। चेतक तेजी के साथ मानसिंह की ओर बढ़ा और मानसिंह के हाथी के सूंड पर अपनी टांगें टिका दीं। महाराणा प्रताप ने अपने भाले से मानसिंह के ऊपर वार किया, लेकिन मानसिंह हाथी पर बने बैठक के घेरे के पीछे छुप गया और वह भाला हाथी के महावत के सीने को भेद दिया।
चेतक हुआ चोटिल:
मानसिंह पर हमले के क्रम में हाथी के सूंड में बंधी तलवार से चेतक का एक पैर चोटिल हो गया। इस स्थिति का फायदा उठाते हुए मुगलों ने महाराणा प्रताप को गिराने की कोशिश की, महाराणा प्रताप अब तक युद्ध लड़ते-लड़ते बहुत अधिक चोटिल हो चुके थे। उनकी स्थिति को देखते हुए मेवाड़ की ओर से लड़ रहे झाला मन्ना, महाराणा प्रताप के पास आए और उनसे उनका मुकुट लेकर खुद महाराणा प्रताप की जगह खड़े हो गए। झाला मन्ना और महाराणा प्रताप की कद-काठी लगभग बराबर थी। इस वजह से मुगलों ने धोखा खा लिया और इस स्थिति का फायदा उठाते हुए महाराणा प्रताप अपने चेतक के साथ युद्ध के मैदान से बाहर निकल गए। हालांकि, उनके पीछे अभी भी मुगलों की एक टुकड़ी पड़ी हुई थी। उस टुकड़ी ने महाराणा प्रताप के ऊपर भाले से वार किया, वह भाला चेतक के दूसरे पैर में जा लगा और चेतक और भी अधिक बुरी तरह से जख्मी हो गया। जंगलों की ओर आगे बढ़ते हुए महाराणा प्रताप के सामने लगभग 26 फीट की खाई आ गई।
इसी स्थिति पर श्याम नारायण पांडे ने लिखा है:
आगे नदियां पड़ी अपार,
घोड़ा कैसे उतरे पार,
राणा ने सोचा इस बार,
तब तक चेतक था उस पार।
महाराणा प्रताप खाई को कैसे पार करें, इस बारे में सोच ही रहे थे कि चेतक ने एक छलांग लगाई और महाराणा प्रताप को उसे खाई की दूसरी ओर पहुंचा दिया। लेकिन यह छलांग चेतक की जीवन की आखिरी छलांग साबित हुई और चेतक ने महाराणा प्रताप की गोद में अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन चेतक की आखिरी छलांग की वजह से महाराणा प्रताप मुगलों से सुरक्षित बच गए। आज भी जब महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, तो उनके घोड़े चेतक का जिक्र अवश्य किया जाता है।
चेतक की गति पर श्याम नारायण पांडे ने लिखा है:
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था,
राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था।