Moosi Maharani Chhatri: अलवर की मूसी महारानी की छतरी जहां का पानी को औषधी के रूप में उपयोग में लिया जाता है, इस पानी को चर्म रोग के साथ गांव के लोगों द्वारा जानवरों के लिए भी दवा का काम करता है। अलवर की मूसी महारानी की छतरी जो सागर जलाशय के पास बनी हुई है।
इसका निर्माण अलवर के शासक विनय सिंह ने 1815 ई. में महाराजा बख्तावर सिंह और उनकी रानी मूसी की याद में करवाया था। मूसी महारानी के बारे में कहना है कि इन्होंने अपने पति के प्रेम में खुद को अपनी इच्छा से चिता पर सती कर लिया था। इस खूबसूरत ऐतिहासिक स्मारक में रानी और राजा की कब्र बनवाई गई थी।
छतरी का परिदृश्य
इस मूसी महारानी की छतरी को लाल पत्थर के स्तम्भों पर बनाया गया था। जिसके ऊपर सफेद मार्बल की गुंबद व छतरी बनी हुई है, जो दो मंजिला स्मारक है, जहां से सूर्योदय व सूर्यास्त का दृश्य दोनों मंजिलों से अलग अलग रूप में दिखाई देती हैं। इस छतरी की ऊपरी मंजिल में जो आकृतियां बनी हुई है, उनको संगमरमर से निर्मित करके बनाया गया है।
जबकि इसके आंतरिक भाग की छत को कुछ सुंदर पौराणिक चित्रों से सजाया गया था और नीचे के भाग को लाल पत्थर से निर्मित किया गया था। इस मूसी महारानी की छतरी में कई फिल्मों की शूटिंग चुकी है और मत्स्य उत्सव के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम व प्रदर्शनी का भी आयोजन भी किया जाता है।
पवित्र पानी से दूर होते हैं रोग
इस छतरी के पानी की खास बात ये है कि जैसे सामान्य पानी को किसी बर्तन व प्लास्टिक की बोतल में बंद करके रखते हैं तो उसमें कीड़े पड़ जाते हैं, लेकिन ये पानी एक पवित्र पानी माना गया है। जिसको सालों तक रखने के बाद भी पानी खराब व उसमें बदबू नहीं आती। इस पानी को बच्चों की नजर उतारने में भी काम लिया जाता है।
जिसमें बच्चों को इस पानी को पिलाने पर व शरीर में नाभि से ऊपरी हिस्से पर लगाने से नजर और चर्म रोग के लिए ये पानी फायदेमंद रहता है, इसके साथ ही गांव के क्षेत्रों के लोगों द्वारा इस पानी को जानवरों की बीमारी के लिए औषधी के रूप में काम में लिया जाता हैं।
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