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Rajasthan History: राजस्थान वीरों की धरती पुरुषों की वजह से नही बल्कि महिलाओं के कारण है। पुरुषों ने तो ज्यातार लड़ाईयां ही लड़ी। वैसे तो यहाँ की धरती पर अनेक वीर महान योद्धा हुए, किंतु उन सभी वीरों के पीछे राजस्थान की वीरांगनाओं का बहुत बड़ा हाथ था। आज हम अपनी कहानी में राजस्थान की इन वीरांगनाओं के बारे में बताएंगे। 

Rajasthan History:  राजस्थान की महिलाएं इस कदर  बहादुर हुआ करती थी की युद्ध में जाते हुए अपने बेटों को माँ सीख देती की आपसी मतभेद बुलाकर तुम्हें युद्ध करना है, यह समय देश की रक्षा का है। जब पति विश्वास घात करके आता तो उसकी पत्नी उसको मार देती थी। जब एक राजा हारकर आता था तो उसकी पत्नी दरवाजे बंद कर लेती थी और यदि राजा युद्ध में जाने से आनाकानी करता तो उसकी पत्नी अपना सर काटकर दे देती थी।

इतनी वीरता पूर्वक बातें करने वाली महिलाएं केवल और केवल राजस्थान में ही हो सकती है । राजस्थान ऐसा है जहां पर महिलाओं की बहादुरी के किस्से सुने जाते हैं। राजस्थान की इन महिलाओं की बहादुरी के बारे में एक कवि ने दोहा कहा था ।

इला न देणी आपणी, हालरियो हुलराय।
पुत सिखावै पालणै,मरण बड़ाई माय।

रानी सहल कंवर

यह एक ऐसी रानी थी जिन्होंने मेवाड़ की खातिर अपना बलिदान दे दिया था। यह कहानी है हाड़ी रानी की जिनके बलिदान के किस्से इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। हाड़ी रानी राजस्थान के महाराज हाडा चौहान राजपूत की बेटी थी। उनका असली नाम सहल कंवर था। उनकी शादी मेवाड़ के सलूंबर के सरदार रतन सिंह चूड़ावत से हुई थी। शादी की कुछ दिन बाद ही उनके पति  सरदार रतन सिंह को युद्ध में जाना पड़ा।

सरदार रतन सिंह अपनी नई नवेली दुल्हन को इस तरह छोड़कर नहीं जाना चाहते थे, लेकिन राजपूत होने के कारण वह अपने धर्म से भी पीछे नहीं हट सकते थे। वह युद्ध में जाने के लिए तैयार हुए और रानी से एक निशानी मांगी ताकि जब भी रानी की याद आए तो उस निशानी को देख सके। हाड़ी रानी समझ चुकी थी कि उनके पति प्रेम मोह में है, इस कारण शायद वह अपना युद्ध में सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाएगें।

हाड़ी रानी ने रतन सिंह को अपना सिर काटकर निशानी के रूप में दे दिया। ऐसा देखकर रतन सिंह बहुत ही दुखी हुआ और उसने पूरे जोश से उसने युद्ध लड़ा, मुगल सेना वापस लौट गई। हाड़ी रानी ने अपनी मातृभूमि की खातिर अपना सिर कलम करने से पहले एक बार भी नहीं सोची और खुशी-खुशी अपनी बलि चढ़ा दी।

रानी हीरादे

 साल 1311 में जालौर जिले के राजपूतों ने अलाउद्दीन खिलजी की हुकूमत को चुनौती दे दी थी।  अलाउद्दीन खिलजी को बार-बार जालौर के राजपूतों से हार का सामना करना पड़ा। एक बार फिर से अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण किया, इस बार भी जालौर के सुल्तान कर्णदेव चौहान खिलजी पर भारी पडे। परन्तु गद्दार बिकादाईया ने  राजगद्दी के लालच में खिजली की फौज को किले के सारे गुप्त द्वार बता दिए, फौज राजकिले में घुस गई।

जब रानी हीरा दे को इस बात का पता पड़ा तो उन्होंने अपने पति से कहा कि मैं एक गद्दार की पत्नी होने के वजाह एक विधवा होना पसंद करूंगी। हीरादे ने ऐसा कहकर तलवार उठाई और अपने पति का सिर एक ही झटके में काट दिया। एक तरफ जालौर की सेना  खिलजी की फौज से सामना कर रही थी, तो दूसरी ओर रानी हीरादे अपने पति का सिर लेकर अग्नि कुंड में कूद गई ।

हाड़ी रानी जसवंत दे

जब रानी जसवंत दे को पता पड़ा कि उनके पति युद्ध से हारकर वापस आ रहा है, तो उन्होंने पूरे जोधपुर में घोषणा करवा दी कि राजा मर चुका है और राजा के लड्डू बटवा दिए। जसवंत सिंह किले के गेट पर पहुंचा तो रानी ने किले के सारे दरवाजे बंद करवा दिए। राजा के मंत्री उनके साथ में थे, उन्होंने रानी को बुलाया और कहां की यह तो आना ही नहीं चाहते थे, इन्हें हम लेकर आए हैं। तब रानी ने कहा कि एक हारे हुए पति का मुख मेरे से नहीं देखा जाएगा।

मंत्रीयों ने कहा कि मरने से ज्यादा इनका जिंदा रहना जरूरी है, इसलिए इनको अंदर आने दें। कहते है  राजा ने रानी से इस हार के लिए माफी मांगी थी। महल के अंदर आने के बाद भी रानी राजा की खूब बेइज्जती किया करती थी और उन्हें यह याद दिलाती  कि वह हारे हुए राजा है
इस प्रकार राजस्थान वीरों की धरती के साथ-साथ वीरांगनाओं की धरती रहा है।

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