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Rajasthan Pearl King: राजस्थान की राजधानी में रहने वाले एक ऐसे व्यक्ति के सफलता की कहानी है, जिसमें आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी नरेन्द्र गिरवा राजस्थान के पर्ल किंग बनें।

Rajasthan Pearl King: समाज में एक बात अक्सर सभी लोगों ने किसी ना किसी से जरुर सुनी होगी कि गलतियां केवल गलतियां नहीं होती बल्कि ये एक मनुष्य के जीवन का वो हिस्सा होती है, जिसकी वजह से वो नई चीजें सिखता है। वहीं कुछ लोग अपनी गलती को अपनी ताकत बना कर सफलता की काह बना लेते हैं।

पर्ल किंग की स्टोरी

आज हम बात करेंगे राजस्थान के पिंक सिटी कहा जाने वाले जयपुर की, जहां का रहने वाला व्यक्ति जिसका नाम नरेन्द्र गिरवा है। नरेंद्र सिहं गिरवा ने उस बात को भी सही साबित कर दिया की है जिसमें हमने अक्सर लोगों के मुंह जुबानी सुनी है। क्या आपने कभी सुनी एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी केवल एक गलती से राजस्थान का पर्ल किंग बन गया। कहानी को आगे बढ़ाते हैं। तो हुआ ये था कि नरेंद्र जो की  

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नरेंद्र का सफलता से पहले जीवन

राजस्थान के जयपुर जिले के किशनगढ़ रेनवाल पर रहने वाले नरेंद्र गिरवा जो की एक साधारण से गांव में जन्में थे। जहां सभी लोगों के आर्थिक आय का साधन केवल खेती थी, जिसको करके वो अपना भरण पोषण करते थे लेकिन नरेंद्र सिंह गिरवा के पास तो खेती करने के लिए उपयुक्त जमीन भी नहीं थी। 

जिस वजह से उन्होने ग्रेजुएशन करने के बाद स्कूल कॉलेज के नजदीक स्टेशनरी आइटम की दुकान खोल  ली, लेकिन मकान मालिक के कहने पर उनको वो दुकान खाली करनी पड़ी। जिसकी वजह से उनको 4 से 5 लाख तक का घाटा हो गया और इसके बाद उनके जीवन में ऐसा समय आया कि जिसमें वो कर्ज में पूरी तरह से डूब गए थे। जिसकी वजह से उनका घर उनकी पत्नी के सिलाई के पैसो से चलने लगा।

गलत टाइपिंग से बने पर्ल किंग

इस घटना के बाद नरेंद्र ने यूट्यूब से खेती करने के आइडिया सीखने लगे, जिसमें  यूट्यूब पर सर्च करते समय उनसे एक बार गलत शब्द टाइप हो गया जिसकी वजह से उनके सामने पर्ल फार्मिंग किए जाने के वीडियो आ गये। गलती से टाइपिंग के वीडियों को देखने के बाद उन्हें लगा कि उनको उनकी मंजिल निल गई। उसके बाद साल 2015 में उन्होने मोतियों की खेती करना शुरू कर दी।

ओडिशा का सीआईएफए में कोर्स

खेती करने से पहले उन्होने ओडिशा के Central Institute of Freshwater Aquaculture (CIFA) में 6 हजार की राशि का भुगतान करके पांच दिन का कोर्स किया। उसके बाद केरल से 500 सीप खरीदे कर ले आए और घर पर मौजुद वाटर टैंक में मोतियों की खेती करना शुरू कर दी।

पर्ल फार्मिंग की प्रक्रिया में परिवर्तन

राजस्थान के शुष्क मौसम की वजह से सीप एक एक कर मरने लगे। देखते ही देखते कुछ दिनों में उनके पास केवल 35 सीप ही बचें। जिसमें उस समय तक उनको 50 हजार रुपये तक का घाटा हो चुका था। लेकिन उनकी कुछ करने के जूनून ने उन्हें हार नहीं मानने दी। जिसकी वजह से उन्होने पर्ल की के खेती किए जाने की विधि में परिवर्तन किया और इसका परिणाम ये हुआ की उनकी सीपियों के मरने की संख्या में कमी आई। 

सीपियों का जन्मदर 70 फिसदी बढ़ी

छह महीने बाद फिर केरल से 500 सीप ले आए और इस बार उनकी मेहनत का रंग दिखाई दिया और सीपियों के जीवित रहने की दर 70 फीसदी हो गयी। इनकी सीपियों की खासियत ये थी कि इनका आकार बटन के जैसा था, जिसके कारण खरीदारों ने तुरंत इनको खरीद लिया। प्रत्येक सीप से दो से चार मोती तक निकलते जिसकी कीमत उनको 200 से 400 रुपये तक मिलते थी।

दूसरे प्रयास में 700 सीपियों खरीदी जिनसे दो लाख रुपये की आमदनी हुई। फिर वो बढ़ते चले गए बाद और एक साथ 3,000 सीपियों को पालने लगे। इसमें एक बार में ही लगभग 5,000 मोती मिलने लगे और 18 महीने में 10 से 15 लाख का मुनाफा होने लगा। अब वो सीधा आमेजन से खुद से अपने मोतियों को बेचते है और अब वो पर्ल फार्मिंग कि जाने की ट्रेनिंग भी देते हैं। 

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