Rajasthan Fact: वीरों की भूमि राजस्थान अपने आप में कई कहानियां समेटे हुए है। अपने शानदार इतिहास और समृद्ध परंपराओं के बीच इस राज्य ने एक बार ऐसे विनाश का यह कल का सामना किया था जिसने इसकी सांस्कृतिक मानसिकता पर एक छाप ही छोड़ दी थी। आईए जानते हैं कि कैसे 56 संख्या को राजस्थान में अशुभ मान लिया गया।
1899-1900 का अकाल
1899-1900 के साल में राजस्थान में एक भयंकर अकाल पड़ा था। विक्रम संवत 1956 की अवधि में राज्य ने लगातार 3 साल तक सुखा झेला था। यह अकाल इतना भयंकर था की बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी थी। जिसकी वजह से राज्य में भोजन और पानी का संकट फैला और बड़े पैमाने पर मौतें हुई। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि लगभग सवा दो लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई। यह तबाही इतनी भयंकर थी की इसको छप्पनिया काल के नाम से जाना जाने लगा।
संख्या 56 का अभिशाप
इस अकाल के बाद लोगों में अंधविश्वास की मान्यताओं ने गहरा असर छोड़ा। इसके बाद यह 56 संख्या दुर्भाग्य का एक पर्याय बन गई। लोगों ने इस संख्या को अशुभ मानना शुरू कर दिया। असर इतना ज्यादा हुआ कि मारवाड़ी और महाजनी व्यापारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यापारिक बहीखातों में जानबूझकर 56वें पन्ने को खाली छोड़ दिया जाता था। समय के साथ-साथ यह अंधविश्वास भी बढ़ता गया और लोग कथाओं का हिस्सा होता चला गया।
3 साल का त्रिकाल
इस अकाल की गंभीरता इस तथ्य से और भी ज्यादा बढ़ गई थी कि यह लगातार 3 साल तक चला था। भूख और प्यास से मनुष्य और पशु दोनों की मृत्यु होने लगी। कहा जाता है कि कुछ मजबूर लोगों ने तो भरूत घास से रोटियां भी बनाई जबकि अन्य ने खेजड़ी के पेड़ की छाल का सेवन किया। लंबे समय तक चले इस अकाल के कारण राजस्थान से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। लोग अपना जीवन कहीं और फिर से बताने को मजबूर हो गए।
हालांकि आज के समय में यह 56 संख्या के अशुभ होने की कहानी धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है। आधुनिक राजस्थान अब पहले जैसी कठिनाइयों से ग्रस्त नहीं है। राजस्थान में अब संसाधनों की कोई कमी नहीं है साथ ही दिन प्रतिदिन राजस्थान तरक्की की ओर अग्रसर होता जा रहा है।
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