Amrita Devi Bishnoi: भारत में सदियों से ही पर्यावरण संरक्षण के लिए काम किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रकृति को लेकर एक कहावत काफी प्रचलित है, जिसमें प्रकृति ही पूजा है की बात की गई हैं। विश्व भर में पर्यावरण को लेकर काफी घटनाएं घटित हुई है, जिसमें सबसे प्रसिद्ध घटना अमृता देवी की बिश्नोई की है। जिन्होने प्रकृति की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया था।
अमृता देवी को पहले से इतना प्यार था कि इन्होंने पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी। जिनको भारत की पहली इको-स्पिरिचुअलिस्ट कहा जाता है। अमृता देवी राजस्थान के जोधपुर जिले की रहने वाली बिश्नोई समाज से थी, जो प्रकृति की पूजा में अपनी आस्था रखती थी।
पेड़ों के लिए अमृता देवी का बलिदान
अमृता देवी बिश्नोई को पेड़ों के प्रति इतना लगाव था कि इन्होंने पेड़ों के लिए अपने जान तक न्योछावर कर दी, जोधपुर के महाराज अभय सिंह ने 1730 ईस्वी में अपने सैनिकों को खेजड़ी के वृक्षों को काटने का आदेश दिया, जिसपर खेजड़ी वृक्ष पवित्र मानने वाला बिश्नोई समाज और अमृता देवी ने वृक्ष को काटने का विरोध करते हुए कहा कि सर साठे रूख रहे तो भी सस्तो जान यानी कि इस वृक्ष के लिए सर भी कट जाए तो इसके लिए ज्यादा नहीं है। अमृता देवी ने खेजड़ी के वर्षों के लिए अपने अपनी जान तक दें दी, लेकिन इन वृक्षों को कटने नहीं दिया।
अमृता देवी का कार्य आज के समय प्रेरणा का कारण बना
आज के इस आधुनिक युग में अमृता देवी का त्याग कई लोगों को प्रेरित करता है, जिसकी वजह से अमृता देवी के नाम से ही अब इस गांव का नाम जाना जाता है। बिश्नोई समाज आज भी अमृता देवी को याद करने के लिए हर साल सितंबर के महीने में इकट्ठा होता है, चिपको आंदोलन भी इसी से प्रेरित हुआ था।
अमृता देवी बिश्नोई वन संरक्षण पुरस्कार
अमृता देवी के नाम पर अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार की शुरुआत की गई, इस पुरस्कार को भारत सरकार के तरफ से दिया जाता है। पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने वालों को दिया जाता है। खेजड़ी का पेड़ शुष्क क्षेत्र में ही उगता है, जो जानवरों के साथ साथ इंसानों के लिए भी उपयोगी है।
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