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Durga Mata Mandir: भारत में देवी आदिशक्ति के कई मंदिर हैं। कुछ ऐसे मंदिर भी हैं, जिनकी मान्यता और रहस्य सुनकर लोग हैरान हो जाते हैं। बता दें कि इस मंदिर के पुजारी मुस्लिम परिवार हैं।

Durga Mata Mandir: देशभर में देवी आदि शक्ति के कई मंदिर हैं, जिसका रहस्य और इतिहास भक्तों को और आकर्षित करता है। माता दुर्गा की ये मंदिर के बारे में जानकर आपको काफी हैरानी होगी। जोधपुर में मां दुर्गा का एक ऐसा मंदिर है, जिसका पुजारी मुस्लिम परिवार के हैं। जाति और धर्म की जंजीरों को तोड़कर करीब 13 पीढ़ी जलालुद्दीन खान का परिवार माता रानी की सेवा कर रहे हैं। आइए जानते हैं कि जलालुद्दीन खान के परिवार और पूर्वजों ने ऐसा क्या किया, जिसका कारण वो माता रानी के भक्त बन गए।

यहां है देवी आदि शक्ति का मंदिर

राजस्थान के जोधपुर जिले में भोपालगढ़ जगह आता है, जहां का एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम बागोरिया है। इस गांव की ऊंची पहाड़ पर माता का एक प्राचीन मंदिर है। माता रानी के इस मंदिर की सेवा मुस्लिम परिवार करती है। अभी इस मंदिर के पुजारी जलालुद्दीन खान हैं। इस मंदिर में भक्तों की बहुत भीड़ रहती है। नवरात्रि जो माता रानी का सबसे प्रिय त्यौहार है, उस दौरान भी लाखों भक्तों की भीड़ रहती है।

ऐसे होता है पूजा का पालन

इस परिवार के जो भी सजस्य पुजारी बनते हैं, वो नमाज नहीं पढ़ते हैं। पूजा-अर्चना के साथ-साथ विधिपूर्वक व्रत का पालन भी होता है। नवरात्रि के पावन दिनों में यहां पर हवन आदि भी होता है। नवरात्रि के दौरान पुजारी, रात्रि के दौरान भी मंदिर परिसर में ही रहते हैं। 

मंदिर के पुजारी ने बताई ये बात

मंदिर के पुजारी जलालुद्दीन खान ने मीडिया से बातचीत में अपने पूर्वजों की रोचक कहानी बताई थी। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज इस जगह पर आकर बस गए, क्योंकि सिंध प्रांत में अकाल पड़ गया था। उस दौरान उनके पूर्वज ऊँट का ग्रुप लेकर मालवा जा रहे थे। रास्ते में उनके ऊँट की तबीयत खराब हो गई थी, जिसकी वजह से उन्हें वही पर रुकना पड़ा था।

माता रानी ने दर्शन दिये

रात्रि विश्राम करते समय उनका पूर्वज खत्म हो गया। उनके पूर्वज के सपने में माता रानी ने दर्शन दिए। माता के उनसे कहा कि पास के बावंडी में मौजुद मूर्ति से भभूत निकल कर उसे ऊंट पर लगा दो। उनके पूर्वज ने माता रानी की बात मानी और ऐसा किया और उनके जितने भी ऊंट थे सब ठीक हो गए।

रुकने का किया फैसला

मां दुर्गा के इस चमत्कार को देखकर जलालुद्दीन खान के पूर्वज ने उस जगह पर रुकने का फैसला किया। उसके बाद उनका परिवार माता रानी की पूजा-अर्चना में लीन हो गए। आज 13 पीढ़ियों बाद भी ये परंपरा चलती आ रही है।

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