Gusainji Temple Nagaur: राजस्थान के नागौर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर अजमेर-नागौर बस मार्ग पर जुंजाला में गुसाईंजी का मंदिर है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिला है, जिसपर अंकित पदचिह्न आस्था और आराधना का मुख्य केंद्र हैं। इस स्थान पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्म के लोग माथा टेककर मन्नत मांगते हैं। लाखों की संख्या में लोग गुसाईंजी मंदिर में आते हैं।
वामन देव के अवतार माने जाते हैं गुसाईंजी
कहा जाता है कि गुसाईंजी भगवान वामन देव का अवतार थे। जिन पदचिह्नों की यहां पर पूजा की जाती है, वो भी भगवान वामन देव के हैं। भगवान वामन देव के लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। भगवान वामन राजा बली के घर पर दक्षिणा लेने पहुंचे थे। तब भगवान वामन ने राजा बली का घमंड तोड़ने के लिए तीन पग जमीन मांगी थी। उन्होंने दो पग में राजा बली का साम्राज्य नाप दिया।
तीसरे पग को रखने के लिए उन्होंने पूंछा कि अब तीसरा पग कहां रखूं, तब राजा बली ने उनसे तीसरा पग उनकी पीठ पर रखने के लिए कहा। भगवान वामन ने बली की पीठ पर तीसरा पग रख दिया, तो बली की पीठ पर उनके दाएं पैर का चिह्न छप गया। कहा जाता है कि ये वही जगह है, जहां पर भगवान बली ने अपना तीसरा पग रखा था।
मक्का तक था राजा बली का साम्राज्य
वहीं ये भी कहा जाता है कि राजा बली का साम्राज्य मक्का तक था। भगवान वामन ने पहला पग मक्का में रखा। दूसरा पग कुरुक्षेत्र में रखा और तीसरा पग जुंजाला के राम सरोवर के पास रखा। जुंजाला के रामसरोवर के पास ही गुंसाईंजी मंदिर बना हुआ है। हालांकि इसको लेकर ये भी कहा जाता है कि भगवान वामन देव ने तीसरा कदम महाबलीपुरम में राजा बली के सिर पर रखा। जुंजाला के तीर्थ रामसरोवर में हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्म के लोग आते हैं। मुस्लिम लोग इन पदचिह्नों को 'बाबा कदम रसूल' मानते हैं।
ये कहानी भी है प्रचलित
वहीं इस मंदिर को लेकर ये भी कहा जाता है कि राजस्थान के लोकदेवता पीरों के पीर रामापीर बाबा रामदेव और लोकदेवता गुसाईंजी गुरू भाई थे। भ्रमण करने के दौरान दोनों में कुछ विवाद हो गया। इस बीच गुसाईंजी महाराज ने गुस्से में अपना पैर जोर से पटक दिया और वहीं रुक गए।
जमीन पर पड़ा उनका निशान कभी मिटा ही नहीं। रामापीर बाबा रामदेव बडे़ थे इसलिए उन्होंने अपने भक्तों को आदेश दिया कि उनके दर्शन कते बाद उनके गुरूभाई के पदचिह्नों के दर्शन जरूर किए जाएं वरना दर्शन पूरे नहीं माने जाएंगे। बाबा रामदेवजी के परिवार के लोग भी यहां अपनी 'जात का जडूला' चढ़ाने के लिए आया करते थे।
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