Nephew Of Pilgrimages: राजस्थान के धौलपुर के जी.टी. रोड से तीन किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखलाओं में स्थित मुचुकुन्द कुंड को सभी तीर्थों का भांजा कहा जाता है। इस कुंड को काफी पवित्र माना जाता है। साथ ही इसके आसपास कुल 108 मंदिरों की श्रृंखला बनी हुई हैं, जिसे तीर्थराज मचकुंड के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि राजा मुचकुंद भगवान श्रीराम से उन्नीस पीढ़ी पहले के 24वें सूर्यवंशी थे।
प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है यह कुंड
108 प्राचीन मंदिरों से घिरा यह कुंज भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। तीर्थराज मुचुकुन्द सरोवर के चारों ओर एक किलोमीटर की परिक्रमा है, जिसे सारे तीर्थों की परिक्रमा भी कहा जाता है। अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर कुंड की पूजा की जाती है।
यहां लगता है लक्खी मेला
हर साल पंचमी और बलदेव छठ के मौके पर यहां लक्खी मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है। साथ ही लोग यहां आकर शादी की मौरछड़ी और कलंगी का विसर्जन करते है। माना जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग से जुड़ी सभी बीमारी दूर हो जाती है।
कुंड से जुड़ा इतिहास
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेता युग में महाराजा मांधाता के 3 पुत्र थे अमरीश, पुरू और मुचुकुण्द। युद्ध नीति का अच्छा ज्ञान होने के कारण देवासुर संग्राम के दौरान इंद्र ने मुचुकुन्द को अपना सेनापति घोषित किया था। इस संग्राम में विजय पाने के बाद महाराज मुचुकुन्द ने विश्राम करने की इच्छा जताई थी। जिसके बाद देवताओं ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी तुम्हें नींद से जगाएगा वो तुम्हारी नेत्र ज्योति से भस्म हो जाएगा। इसके बाद महाराज मुचुकुन्द श्यामाष्चल पर्वत की एक गुफा में जाकर सो गए।
वहीं दूसरी ओर जरासंध ने कृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर 18वीं बार चढ़ाई की थी। इसमें महर्षि गाग्र्य का पुत्र और म्लेक्ष देश का राजा कालियावन ने जरासंध का साथ दिया था। कालियावन को भगवान शिव ने अजय होने का वरदान दिया था। इसी कारण से भगवान श्री कृष्ण रण क्षेत्र को छोड़कर भाग गए थे। भागते भागते वे मथुरा से लगभग सवा सौ किमी दूर तक श्यामाश्चल पर्वत की उस गुफा में आ गये थे जहां महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पीताम्बरी मुचुकुन्द के ऊपर डालकर एक चट्टान के पीछे जाकर छिप गए। जैसे ही मुचुकुन्द जगे उनकी आंखों के सामने कालियावन आ गया और वहीं भस्म हो गया।
इसके बाद भगवान कृष्ण ने मुचुकुन्द जी को विष्णु रूप के दर्शन दिए। इसके बाद महाराज मुचुकुन्द जी ने ऋषि पंचमी के दिन पांच कुण्डीय यज्ञ किया और इस दौरान सभी देवी देवताओं को बुलाया। भगवान कृष्ण से आज्ञा लेकर मुचुकुन्द तपस्या के लिए गंधमादन पर्वत पर प्रस्थान कर गए। यह वही स्थान है जहां उन्होंने यज्ञ किया था। सभी तीर्थों का नेह जुड़ जाने के कारण इस सरोवर को सभी तीर्थों का भांजा भी कहा जाता है।
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