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Ram Charit Manas: रामचरितमानस हिन्दु धर्म का एक ग्रंथ है, जो संसारिक मोह माया के बीच एक व्यक्ति को जीवन जीने और अपने कर्तव्य को समझने का ज्ञान प्रदान करता हैं। इसके पाठ से जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

Ram Charit Manas: रामचरितमानस स्नातन धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ है, इसका पाठ करने से साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है और सत्य के मार्ग की ओर चलने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। आज हम जानेगें 5 ऐसी रामचरितमानस चौपाईयों के बारे में जिनसे आपके जीवन की उन  सभी समस्याओं का सामाधान मिल पाएंगे। 

रामचरितमानस की चौपाई को लेकर मान्यता ये मान्यता है कि रोजाना घर में रामचरितमानस का पाठ करने से हनुमान जी स्वयं उस घर के लोगों की हर विपदा से रक्षा करते हैं। इसकी चौपाई में जीवन की हर परिस्थिति को बेहतर तरीके से समझने की क्षमता प्रदान करती है और साथ ही सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित भी करती हैं। 

1. हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।कलप कोटि लगि जाहिं न गाए ॥

इस चौपाई का अर्थ है कि हरि की महिमा अनंत हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। उनकी कथा भी अनंत  है। सभी संत हरि की कथा को  को बहुत भिन्न-भिन्न तरीको से कहते और सुनते हैं। इस चौपाई में बताया गया है कि भगवान श्री रामचंद्र के सुंदर चरित्र का बखान किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रभु श्री राम के चरित्र का बखान करोड़ों कल्पों में भी नहीं गाया जा सकता।

2. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥ 
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

इस चौपाई का अर्थ है कि जो कुछ भी इस संसार में जो हो रहा है या होने वाला है, वो सब भगवान श्री राम ने रच रखा है। तो संसारिक  मोह माया के विषय के संबंध में तर्क करने या इसके बारे में बहस करने  का कोई फायदा नहीं होगा और ऐसा कहकर भगवान शिव हरि का नाम जपने लगे और सती भी वहां गईं, जहां सुख का धाम हो अर्थात्  प्रभु श्री राम के पास गई।

3. काम, क्रोध, मद, लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥

इस चौपाई का वर्णन करते हुए बताया गया है कि मनुष्य को काम, क्रोध, मद और लोभ को त्याग देना चाहिए क्योंकि ये सब नरक के द्वार अर्थात् बुराई की ओर ले जाने के रास्ते हैं। इसलिए इन सबको छोड़कर श्री रामचंद्रजी को भजिए अर्थात् उनकी राम नाम को भजे व आराधना  करें। विभीषण अपने बड़े भाई रावण को सच्चाई का सामना करवाते हुए कहते हैं कि अहंकार, काम, क्रोध ये सभी मनुष्य को पाप के मार्ग पर ले जाते है। जिससे मनुष्य का सर्वंनाश हो जाता हैं।  इसलिए इन्हें त्याग देना चाहिए। और संतों की तरह राम के नाम का जाप करना चाहिए।

4.धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।                                                                                      बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥

इसमें इस बात को बताया गया है कि धैर्य, धर्म, मित्र और नारी  इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। अर्थात् कठिन समय पर ही परखा जाता हैं।  वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन होने पर भी एक मनुष्य को अपनी कड़ी से कड़ी स्थिति में भी धैर्य के साथ सही मार्ग पर टिके रहना चाहिए।

5.नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
   कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

रामचरित मानस में ये चौपाई उस समय को बताती है, जब प्रभु श्री राम समुंद्र को पार करने के लिए समुंद्र देव से रास्ता मांगने के लिए ध्यान करने जा रहे थे। तभी लक्ष्मणजी ने भगवान रामजी को उनकी शक्ति और क्षमता को याद दिलाते हुए कहा था कि आप खुद इतने महान शक्तिशाली हैं कि आपके एक तीर समुद्र को सुखा कर सकती हैं, फिर समुंद्र देव से रास्ते के लिए अनुनय विनय क्यों कर रहे हो।

इतना कहने पर भी भगवान राम अपनी शक्ति से पहले शांति से परिस्थितियों को हल करने का प्रयास किया और इसके उपलक्ष में कहा  कि एक यौद्दा को  शक्तिशाली के साथ संयमी होना भी जरूरी है। क्योंकि जब आप अपने भरोसे पर काम करोगें तब  ईश्वर खुद हर परिस्थिति में आपकी सहायता करेगा।

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