Holi 2025: राजस्थान के बीकानेर में देश का एक अनोखा मंदिर स्थित है, जहां की 500 साल पुरानी परंपरा और संस्कृति अभी भी निभाई जाती है। जिसमें होली शुरू करने से पहले राजपरिवार की कुलदेवी से परमिशन लेनी जरूरी होती है। जिसके बाद ही पूरे शहर में होली का पर्व मनाया जाता है। खास बात यह है कि यह अनूठी परंपरा लगभग 537 साल से चलती आ रही है। शाकद्वीपीय समाज नगर स्थापना के बाद से इस संस्कृति को निभाया जा रहा है।
पहले भगवान गणेश की होती है पूजा
शाकद्वीपीय समाज के पुरुषोत्तम लाल सेवग और पवन शर्मा ने बताया कि होली बनाने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है और उसके बाद माता जी को भोज लगाया जाता है। इस दौरान हास्य रस के गीत, रस भरा गीत ‘पन्ना’ और बच्चों से लेकर बुजुर्गों की भागीदारी देखने को मिलती है। इसके बाद गैर गोगागेट से प्रवेश करते हुए बीकानेर शहर में आती है और इसे दूसरे समाज को सौंपा जाता है। इस कार्यक्रम के बाद ही होली का आयोजन किया जाता है।
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गुलाल व इत्र से होती है होली की शुरुआत
बता दें कि बीकानेर रियासत के संस्थापक राव बीकाजी ने शहर की स्थापना के बाद शाकद्वीपीय समाज द्वारा राजपरिवार की कुलदेवी नागणेची जी माता को फाग खेलाकर शहर में आने की अनुमति दी थी। तभी से शाकद्वीपीय समाज की ओर से नागणेची जी मंदिर से फाग गीत गाते हुए गेर के रूप में प्रवेश करने की परंपरा निभाई जा रही है।
बता दें कि होली के दौरान शाम साढ़े 6 बजे से समाज के सभी लोग नागणेची जी मंदिर पहुंचते है और रात 7 से 8 बजे तक फाग गीत गाते है। इस दौरान लोग गुलाल, फूल और इत्र से माता के साथ फाग खेलते है। रात 8 बजे की आरती के बाद ही गुलाल उछाल कर अपने-अपने घरों की ओर रवाना हो जाते हैं।