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Jaipur Virat Nagar: राजस्थान में वैसे तो महाभारत से जुड़े कई जगहें हैं, जिसके बारे में आप जानते होंगे, लेकिन जयपुर में एक ऐसी जगह भी है, जो पांडवों के अज्ञातवास के लिए जाना जाता है।

Jaipur Virat Nagar: राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक ऐसा स्थान है, जो अपने रहस्यमयी इतिहास के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं। राजस्थान के विराटनगर में पाडंवो का शासन काल हुआ करता था, लेकिन अभी तक इस पांडव कालीन शिव मंदिर को न तो पर्यटन के रूप में और न ही धार्मिक स्थल के रूप में पहचान मिल सकी।

विराट नगर का इतिहास

यह स्थल राजा विराट के मत्स्य प्रदेश की राजधानी के रूप में विख्यात था। यहीं पर पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का समय व्यतीत किया था। ये वही जगह है जहां पर पांडवों ने कौरवों से छिपते हुए एक साल का अज्ञातवास बिताया था। इस मंदिर के आस पास के लोग बताते हैं कि इस मन्दिर के पास खुदाई करते समय यहां के लोगों को पांडव कालीन कई कलाकृतियां मिलीं, जिन्हें कुछ लोगों ने सहेजकर अपने घरों में रख रखा है।

पुरातत्व विभाग के आधीन 

विराटनगर का ये महादेव मंदिर पुरातत्व विभाग के आधीन है। लेकिन पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते मन्दिर की कोई देखरेख नही की जा रही है। पुरात्तव विभाग न तो खुद इसपर काम करता है और न ही ग्रामीणों को मन्दिर के लिये कुछ काम करने की अनुमति देता है, जिस कारण इसकी जानकारी पर्यटकों को नहीं है।

विराटनगर की प्रसिद्धता

ये जगह जयपुर से 85 किलोमीटर दूर खूबसूरत अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित है। इसका ये मंदिर पहाड़ों के ऊपर बना हुआ है, जहां से विराटनगर का नजारा अत्यधिक मनमोहक लगता है। विराट नगर की बुद्ध धाम बीजक पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक चट्टान है, जिस पर भाबरू बैराठ शिलालेख उत्कीर्ण है। इसे बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों के अलावा आम लोग भी पढ़ सकते थे।

इस शिलालेख को भाबरू शिलालेख के नाम से भी जाना जाता था। यह शिलालेख पाली व ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ था। इस मंदिर के आसपास की जगह हरयाली से भरी हुई है और यहां पर पंचखंड पर्वत पर भीम तालाब और इसके ही निकट जैन मंदिर और अकबर की छतरी है और कहा ये भी जाता है कि ये वही जगह जहां अकबर शिकार के समय विश्राम करता था। 

मंदिर की बनावट

इस जगह ऊपर दो समतल मैदान है, जहां पर व्यवस्थित तरीके से रास्ता बनाया गया है। इस मैदान के मध्य में एक गोलाकार परिक्रमा युक्त ईंटों का मन्दिर था, जो आयताकार चार दीवारी से घिरा हुआ है। इस मन्दिर के गोलाकार भीतरी द्वार पर 27 लकड़ी के खम्भे लगे हुए थे। ये अवशेष एक बौद्ध स्तूप के हैं जिसे सांची व सारनाथ के बौद्ध स्तूपों की तरह गुम्बदाकार बनाया गया था।

यह बौद्ध मंदिर गोलाकार ईंटों की दीवार से बना हुआ था, जिसके चारों तरफ 7 फीट चौड़ी गैलरी है। इस गोलाकार मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की तरफ खुलता हुआ 6 फीट चौड़ा है। बाहर की दीवार 1 फीट चौड़ी ईंटों की बनी हुई है। इसी प्लेटफार्म पर बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों आदि के चिंतन मनन करने हेतु श्रावक गृह बने हुए थे।

यहां बनी 12 कोठरियों के अलावा अन्य कई कोठरियों के अवशेष भी चारों तरफ देखे जा सकते हैं। ये कोठरियां वर्गाकार रूप में बनाई जाती थीं। इन पर किए गए निर्माण कार्यों पर सुंदर आकर्षक प्लास्टर किया जाता था। इस प्लेटफार्म के बीच में पश्चिम की तरफ शिला खण्डों को काटकर गुहा गृह बनाया गया था जो दो तरफ से खुलता था। इसमें भी भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के निवास का प्रबंध किया गया था। इस गुहा गृह के नीचे एक चट्टान काटकर कुन्ड अर्थात् टंकी भी बनाई गई है जिसमें पूजा व पीने के लिए पानी इकट्ठा किया जाता था।

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