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Rajasthan Culture: शीतलाष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना की जाती है। भारतपुर में इस दिन गधे की भी पूजा होती है। गधा शीतला माता का वाहन है। शीतलाष्टमी की पूजा को बासोड़ा भी कहते हैं।

Rajasthan Culture: राजस्थान अपनी अनोखी परंपराओं और संस्कृति के लिए दूर-दूर तक मशहूर है। राजस्थान को 'रंगीलो राजस्थान' के नाम से भी जाना जाता है। वीरों की इस भूमि पर हर इंसान, जानवर, अमीर या गरीब सभी को उच्च सम्मान दिया जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि आपको यह जानकर हैरानी होगी कि राजस्थान के भरतपुर जिले में गधे की भी पूजा की जाती है। इस लेख में हम आपको इसके पीछे की छुपी कहानी के बारे में बताएंगे। आईए जानते हैं। 

सम्मान की परंपरा 

राजस्थान में जानवरों के प्रति स्नेह और श्रद्धा देखना काफी आम बात है। शीतला माता की पूजा के दौरान महिलाएं भक्ति और देखभाल के साथ गधों के माथे पर हल्दी और रोली का तिलक लगाती हैं और साथ ही उन्हें पकवान खिलाती हैं। हिंदू वैदिक ज्योतिष के अनुसार शीतला अष्टमी, चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी और होली के 7 दिन बाद आती है। ऐसी मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा अर्चना की जाती है। 

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शीतला माता की पूजा 

शीतला अष्टमी पर परिवार रात को भोजन तैयार करते हैं और दिन की सुबह उस भोजन को प्रसाद के रूप में माता को चढ़ाते हैं। अनोखी बात यह है कि परोसें जाने वाला प्रसाद ताजा नहीं बल्कि बासी होता है। ऐसा माना जाता है कि शीतला माता को बासी भोजन चढ़ाने से उनकी कृपा का आवाहन होता है। 

जब शीतला माता की पूजा करने के लिए महिलाएं मंदिर में जाती हैं तो साथ में गधे की पूजा भी करती हैं। गधा शीतला माता की सवारी है इसी वजह से शीतला माता की पूजा के साथ-साथ उनकी सवारी की भी पूजा होती है।

शीतला माता की कथा 

कहा जाता है कि एक बार नगर में सभी ने शीतला माता को भोग लगाने के लिए गर्म और ताजा तैयार व्यंजन बनवाएं। इन व्यंजनों की तीव्र गर्मी ने शीतला माता के मुंह को जला दिया था। जिसके बल शीतला माता क्रोधित हो गई और उन्होंने पूरा शहर जला दिया। जब पूरा शहर जल रहा था तो मात्र एक बूढी महिला का घर था जो नहीं जला। जब लोगों ने उसे बूढी महिला से पूछा कि तुम्हारा घर कैसे नहीं चला तो उन्होंने बताया कि उन्होंने रात को ही अपना प्रसाद बनाकर रख दिया था और अगले दिन देवी को बासी भोजन के रूप में चढ़ा दिया। इससे शीतला माता ने उनके घर को जलने से बचा लिया। इसके बाद सभी नगर वासियों ने शीतला माता से माफी मांगी ‌ और तभी से बासी प्रसाद चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई।

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