Rajasthan: राजस्थान के एक ऐसा राज्य है जहां के हर इलाके व शहर में आपको लाखों रोमांचकारी द्श्य देखने को मिलेगें। जैसलमेर के रेगिस्तान में स्थित म्यूजियम पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है। इस अनोखे म्यूजियम को एक सेवानिवृत्त अध्यापक द्वारा बनाया गया था।
राजस्थान अपने समृद्ध इतिहास, मीठी मनुहार, लजीज खाने, कला, संस्कृति, गगनचुम्बी किलों, रेतीले टीलों और अविश्वसनीय करतबों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इन्ही करतबों में शामिल है राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्य, चित्रकला, सांझी, मांडणा, फड़, चोपड़ा, बेवाण और कठपुतली। देश विदेश से आए पर्यटक यहां आकर कठपुतली का नृत्य जरूर देखते हैं।
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कठपुतली की विरासत और संस्कृति
कठपुतली नृत्य राजस्थान की लोकनाट्य की ही एक शैली माना जाता है। यह एक प्राचीन नाटकीय खेल होता है जिसमें लकड़ी, धागे, प्लास्टिक या फिर प्लास्टर ऑफ पेरिस की गुड़िया बनाकर जीवन के प्रसंगों की अभिव्यक्ति और मंचन किया जाता है। पुतला नामक नायक का उल्लेख ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी के अष्टाध्यायी में मिलता है। यह कला की प्राचीनता के संबंध में तमिल ग्रंथ ‘शिल्पादिकारम्’ में भी पढ़ने को मिलता है। इसके अलावा चर्चित कथा ‘सिंहासन बत्तीसी’ में विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का वर्णन किया गया है।
म्यूजियम में देखने को मिलता है कठपुतली नृत्य
यदि आप जैसलमेर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो इस म्यूजियम को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करें। गडीसर तालाब के सामने स्थित इस म्यूजियम को सेवानिवृत्त अध्यापक और इतिहासकार, लेखक नन्दकिशोर शर्मा ने संचालित किया था। यहां आपको कठपुतली नृत्य के अलावा जैसलमेर के इतिहास, कला व संस्कृति से जुड़ी जानकारी भी मिलेगी। बता दें कि म्यूजियम में कठपुतली शो शाम 06:30 से 08:30 बजे तक दर्शाया जाता है।
इन विषयों पर दिखाया जाता है कठपुतली का नृत्य
पहले कठपुतली का नृत्य अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद की कथाओं पर आधारित होता था, लेकिन अब इस नृत्य के माध्यम से सामाजिक विषयों को दिखाया जाता है। साथ ही हास्य-व्यंग्य और ज्ञान संबंधी अन्य मनोरंजक कार्यक्रम भी होते है।